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    महाभारत खंड - 1 युद्ध के बीज -5

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    " महाभिष ! " रानी ने अस्फुट स्वर में कहा एवं आकाश की ओर दृष्टि जमा दी ।
    और फिर यूँ कथा सुनाने लगी मानो सब कुछ सामने घटित हो रहा हो ।
    *   *   *    *   *
    इक्ष्वाकु वंश के महाप्रतापी राजा महाभिष ने एक हज़ार अश्वमेध एवं एक सौ राजसूय यज्ञ  किये । तीनों लोक में उस समय उनसे अधिक पुण्यात्मा एवं सत्यवादी कोई नहीं था । उनका पुण्य फलित हुआ एवं उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई ।
    स्वर्ग के संपूर्ण सुखों का उपभोग करते हुए भी आज न जाने क्यों राजा महाभिष के मन में एकांत सेवन की इच्छा उत्पन्न हो रही थी । राजा महाभिष सबसे अलग स्वर्गलोक के उपवन में कल्पवृक्ष के नीचे चिंतामग्न बैठे थे । संपूर्ण सुखों के उपलब्ध होने पर भी उनका हृदय न जाने क्यों आज सूना - सूना सा लग रहा था । संपूर्ण सांसारिक एवं पारलौकिक सुखों का उपभोग भी उनके मन को संतोष प्रदान नहीं कर पा रहा था । सुख एवं दुःख का विश्लेषण करते राजा महाभिष अपने ही विचारों में खोये थे । तभी उनके कानों में हँसी की ध्वनि गूँज उठी । उन्होंने अपनी दृष्टि उस ओर की । सामने अप्सराओं का एक दल हँसी - ठिठोली करता चला आ रहा था । उनके दल के मध्य में एक दिव्य सुंदरी थी । जिसे स्वर्गलोक में महाभिष ने कभी नहीं देखा था । अत्यंत गौर वर्ण की धवल श्वेत वस्त्रों से सुसज्जित उस सुंदरी को देखते ही महाभिष अपने अस्तित्व को भूल से गए । न जाने कब वह अपूर्व सुंदरी उनके सामने से निकल गयी , उन्हें पता ही नहीं चला । वह उसी ओर काफी देर तक देखते रहे । ऐसा सौंदर्य उन्होंने संपूर्ण स्वर्गलोक में कहीं नहीं देखा था । जबतक उनकी चेतना लौटी वह सामने से जा चुकी थी । राजा महाभिष ने अपने हृदय में हल्की पीड़ा को महसूस किया । शायद यह प्रथम दृष्टि में होनेवाले प्रेम की सुखद अनुभूति थी ।
    किसी की पुकार से उनकी तंद्रा भंग हुई ।
    " भगवान् ब्रह्मा स्वर्गलोक में पधारे हैं । संपूर्ण स्वर्गलोक के वासी उनके आशीर्वाद हेतु उनके समक्ष उपस्थित हो रहे हैं । आप भी उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर धन्य हों । "
    स्वर्गलोक के विशिष्ट अनुचर ने अत्यंत विनम्र स्वर में राजा महाभिष से कहा । भगवान् ब्रह्मा के आगमन की सूचना से महाभिष अत्यंत प्रसन्न हुए एवं तत्क्षण ही उनसे मिलने चल पड़े ।
    इंद्र की सभा में सर्वोच्च विशिष्ट आसन पर भगवान ब्रह्मा को स्थान दिया गया था । सभी देवतागण एक - एक कर उनका चरणस्पर्श कर आशीर्वाद ले रहे थे । राजा महाभिष भी उनसे आशीर्वाद लेकर समीप ही क्रम से खड़े देवताओं के समीप खड़े हो गए ।
    मानों आशीर्वाद तुरंत ही फलीभूत हो गया हो । अभी कुछ समय पूर्व जिस सुंदरी को उन्होंने उपवन में देखा था , सामने प्रकट हुई ।  राजा की पलकें स्थिर हो गयीं । वह निर्निमेष उस दिव्य मुखमंडल को देखने लगे । भगवान ब्रह्मा से आशीर्वाद लेकर वह भी महाभिष के सामने ही खड़ी हो गयीं । श्वेत उत्तरीय ओढ़े वह अपूर्व सौंदर्य की मूर्ति लग रही थी । एकटक निहारते महाभिष पर भी उसकी दृष्टि गयी । स्वर्गलोक में उस समय  उपस्थित समस्त देवताओं से भी आकर्षक दिख रहे राजा महाभिष पर उसकी दृष्टि स्थिर हो गयी । समस्त सभा भगवान ब्रह्मा की ओर देख रही थी । किन्तु , इस सभा में उपस्थित ये दो लोग नयनों से जो वार्तालाप कर रहे थे उसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं था । दोनों एक - दूसरे के सौंदर्य पर मुग्ध सबकुछ भूल चुके थे । सहसा समीर का एक झोंका आया एवं अपनी सुध -बुध खो चुकी उस सुंदरी का उत्तरीय उड़कर भगवान् ब्रह्मा के चरणों के समीप गिर पड़ा । उत्तरीय को वहाँ गिरते देखकर सबकी दृष्टि उस सुंदरी की ओर गयी । उत्तरीय विहीन शरीर को देखकर लज्जावश एवं स्वर्गलोक के नैतिक विधान को मानते हुए सभी देवताओं ने अपना सिर नीचे कर लिया । किन्तु, महाभिष एवं वह सुंदरी एक दूसरे को देखते रहे । उनके लिए एक - दूसरे के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व ही नहीं था । इस असहज स्थिति को देखकर पास ही खड़ी एक अप्सरा ने आगे बढ़कर वह उत्तरीय लाकर उस सुंदरी के शरीर को ढँक दिया । उत्तरीय के स्पर्श से मानों उसकी तंद्रा भंग हुई । उसे उस असहज स्थिति का बोध हुआ । महाभिष की भी चेतना लौटी ।
    अचानक ब्रह्मा का क्रोधित स्वर गूँज उठा ।
    " महाभिष ! तुमने स्वर्गलोक के नैतिक विधान का उल्लंघन किया है । जिस स्वर्गलोक में ऐसी परिस्थिति में लज्जा से अपनी दृष्टि स्वयं नीचे कर लेने का विधान हो , वहाँ तुमने असंयम का परिचय दिया है । तुम इस स्वर्गलोक के योग्य नहीं हो । मैं तुम्हे शाप देता हूँ कि तुम पुनः पृथ्वी पर जन्म लोगे एवं जबतक तुम्हें इन कामनाओं से विरक्ति नहीं होगी , तुम्हे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलेगा ।
    गंगा ! तुमने भी ऐसी परिस्थिति में लज्जा को त्यागकर अपने असंयम का परिचय दिया है । तुम्हे पृथ्वी पर एक मानवी के समान व्यवहार करना होगा एवं वहां के सांसारिक चक्र में समय व्यतीत कर अपनी कामनाओं से मुक्ति पानी होगी । "
    संपूर्ण देवगण ब्रह्मा के शाप को सुनकर स्तब्ध थे ।
    गंगा ! यह नाम सुनकर महाभिष को उस सुंदरी के नाम का ज्ञान हुआ । महाभिष के मुख के भावों पर शाप को सुनकर भी कोई परिवर्तन नहीं आया । उन्होंने स्थिर भाव से हाथ जोड़कर ब्रह्मा से कहा -
    " भगवन् ! आपके शाप को मैं स्वीकार करता हूँ । अगर आप शाप के बदले मात्र आदेश भी करते तो मैं सहर्ष पृथ्वी पर वापस चला जाता । किन्तु , मेरे मन में कुछ प्रश्न हैं । अगर आज्ञा हो तो आपसे ये प्रश्न करूँ । "
    राजा महाभिष के शालीन व्यवहार से ब्रह्मा का क्रोध थोडा शांत हुआ । उन्होंने प्रश्न पूछने की आज्ञा दी । महाभिष ने कहा -
    " मैने आजतक कभी भी कोई असत्य वचन नहीं कहा एवं आज भी मात्र सत्य ही कहूँगा । मैंने देवी गंगा को जिस भाव से देखा उसमें किंचित मात्र की भी मलिनता नहीं थी । मेरा प्रेम विशुद्ध था । शुद्ध हृदय से प्रेम के वशीभूत होकर मैंने उन्हें देखा । जिस प्रेम की महिमा का गुणगान करते हमारे शास्त्र नहीं थकते उस प्रेम के लिए दंड क्यों ? प्रेम हृदय में कभी भी उत्पन्न हो सकता है । विशुद्ध प्रेम देश ,काल एवं परिस्थिति से परे होता है । फिर मुझे इस प्रेम के लिए दंड क्यों ? "
    इतना कहकर महाभिष ने अपना सिर झुका लिया ।
    महाभिष के प्रश्नों ने पूरी सभा को विचलित कर दिया । समस्त सभा एवं ब्रह्मा सोच में पड़ गए । महाभिष के वचन ने गंगा के मन पर अमिट छाप छोड़ी । प्रेम के इस सहज प्रकटीकरण से गंगा की आँखे लज्जा से झुक गयीं। किन्तु , नियति कितनी निष्ठुर है । जिस प्रेम को अभी - अभी पाया उसे तुरंत ही ब्रह्मा के शाप ने उससे कितना दूर कर दिया । अब ना जाने कितने वर्षों का वियोग लिखा था गंगा के भाग्य में ।
    कुछ क्षण पश्चात ब्रह्मा बोले -
    " महाभिष ! तुम्हारा कथन सत्य है । किन्तु विधि के विधान को कोई नहीं जानता । अगर मेरे मुख से यह शाप निकला है तो जरूर इसका कोई - न - कोई प्रयोजन है । कभी - कभी कुछ शाप भी इस लोक के हितार्थ ही होते हैं । तुम्हारा पृथ्वी पर जन्म लेना किसी प्रयोजनवश है । जाओ ! मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है । "
    *   *    *    *    *
    हे राजन् ! तुम वही महाभिष हो और मैं गंगा हूँ जो आपके राज्य में सदा नदी के रूप में प्रवाहित होती हूँ । हमारा प्रेम इस पृथ्वी पर आकर फलीभूत हुआ । मैं न जाने कितने वर्षों तक तुम्हारी प्रतीक्षा करती रही । प्रथम बार मुझे देखने के उपरान्त मात्र कुछ दिनों की प्रतीक्षा से आप कितने व्यग्र हो उठे थे । तनिक विचार कर देखिये की इतने वर्षों तक मैंने आपके प्रेम की प्रतीक्षा में कितनी पीड़ा को सहन किया होगा ।
    गंगा के नेत्र अश्रु से भींग उठे -
    " किन्तु , अब पुनः मुझे आपसे अलग होना होगा । अपने वचन को तोड़कर आपने इस वियोग का समय निश्चित कर दिया है । "
    राजा शांतनु अवाक् थे ।
    आह ! उनका प्रेम कितना पुराना था । और जिसको उन्होंने इतने कठोर हृदय का समझा उसके हृदय में इतना प्रेम ! शांतनु के नेत्र भी अश्रु से छलछला उठे ।
    सहसा उन्हें अपने पुत्रों का ध्यान आया -
    " किन्तु, मेरे सात पुत्रों की हत्या ! यह कैसा प्रेम है ? मुझे पुत्रों की असमय मृत्यु का क्लेश क्यों दिया ? "
    शांतनु के स्वर में रोष था ।
    क्रमशः ........
    लेखक - राजू रंजन

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